गोलीबारी के चलते सीमावर्ती गाँवों के लोगों का हर दिन मुश्किलों भरा By सुरेश एस डुग्गर Due to the firing, the people of the border villages face difficulties every day.




सुरेश डुग्गर
जम्मू फ्रंटियर पर जीरो लाइन से सटे भारतीय सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों में से प्रत्येक की आज अपनी-अपनी दुखभरी दास्तान है। किसी की समस्या कुछ है तो किसी की कुछ लेकिन सभी की समस्याओं का निचोड़ यही निकलता है कि उसके लिए पाकिस्तान तथा उसके सैनिक दोषी हैं जिनके कारण इन लोगों को अनेकों संकटों के दौर से गुजरना पड़ रहा है। जो तब तक जारी रह सकते हैं जब तक सीमा का प्रश्न बरकरार है।

जम्मू फ्रंटियर की अंतरराष्ट्रीय सीमा के गांवों में समय के साथ-साथ समस्याओं का रूप भी बदलता जा रहा है। कुछेक अरसे में जहां पाकिस्तानी रेंजरों द्वारा इस ओर घुसपैठ करके आम नागरिकों की पिटाई के मामलों में वृद्धि हुई है वहीं अपने पूर्वजों के मकान और खेत छोड़ शहरों की ओर स्थाई तौर पर पलायन करने की प्रवृत्ति ने भी जोर पकड़ा है। यही कारण है कि अधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि सीमा के साथ सटे शहरों की आबादी में वृद्धि होने लगी है जबकि सीमावर्ती गांवों में कई खेत और मकान अक्सर अब खाली नजर आने लगे हैं।

हीरानगर के लोंडी गांव के रहने वाले सुनील सिंह सीमा पर बने वातावरण से परेशान हैं क्योंकि पिछले कई दिनों से इस माहौल ने उसे घर पर ही बांध रखा है और वह अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए 60 किमी दूर कालेज में नहीं जा पाया है। रीगाल के रहने वाले जीत लाल की परेशानी यह है कि उसे अभी भी अपने खेतों में जाने की अनुमति नहीं है क्योंकि सीमा रेखा से सटे खेतों में जाना उसके लिए खतरे से खाली नहीं है जबकि सामने पाक सैनिक मोर्चा जमाए बैठे हों। और सादे चक के रहने वाला बलजीत गत तीन महीनों से बिस्तर से ही बंधा है क्योंकि वह पाक रेंजरों की पिटाई का शिकार हुआ है।

पढ़ाई का हर्जा, खेतों में कई दिनों तक न जा पाना, पलायन के लिए हमेशा ही तैयार रहना यह तो उन सभी गांवों में आम समस्या है या यूं कहा जाए कि उन लोगों की जिन्दगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है जो सीमा के साथ सटे गांवों में रहते हैं जो आजकल गर्माहट लिए हुए है। हजारों की तादाद में लोग इन गांवों में रहते हैं लेकिन पाकिस्तान की ओर से बढ़ते दबाव के कारण अब वे भी भयभीत होने लगे हैं जिसने अधिकारियों को भी चिंता में डाला है।

यह बात अलग है कि इन गांवों में सुविधाओं का हमेशा ही अभाव रहा है लेकिन सीमा पर बढ़ने वाले तनाव ने इसमें भी अपना भरपूर योगदान दिया है जिसके कारण उनमें और कमी आई है। अध्यापक, चिकित्सा सुविधाएं तो वैसे भी इन क्षेत्रों में नाममात्र की ही हैं लेकिन बावजूद इसके लोग किसी प्रकार दुखदर्द सहन कर अपना गुजारा कर ही रहे थे कि दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव ने एक कारण दिया है पलायन के लिए अपना बोरिया बिस्तर उठाने को। लेकिन इस संदर्भ में इसे याद रखना आवश्यक होता है कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों द्वारा हमेशा ही उस समय पलायन का रास्ता अख्तियार किया जाता रहा है जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि सीमावर्ती गांवों में लोग अच्छी स्थिति में न रहते हों बल्कि शहरों से अच्छे मकान और बंगलों का निर्माण किया जा चुका है। यही नहीं कई गांव जो जीरो लाइन से मात्र सात-आठ सौ मीटर की दूरी पर स्थित हैं और जब भी सीमा पर तनावपूर्ण माहौल होता है तो इन गावों के उन लोगों को अपने घरों की चिंता सताने लगती है जिन्होंने कई-कई मंजिला कोठियों का निर्माण किया हुआ है। लेकिन इन सब परिस्थितियों के बावजूद भी आज सीमावासी किसी प्रकार अपने दिनों को काट रहे हैं हालांकि सरकार की ओर से उनको नजरअंदाज ही किया जाता रहा है और उनके विकास के नाम पर सिर्फ फाइलों को ही भरा जा रहा है।

अधिकतर लोग सीमा पर उत्पन्न परिस्थितियों के लिए जहां तारबंदी को दोषी ठहराते हैं वहीं अब सीमा सुरक्षा बल को भी दोषी ठहराने लगे हैं, जिन पर आम लोगों का आरोप है कि वह पाकिस्तानी गोलीबारी का उत्तर उसी प्रकार देने से कतराती है जिस प्रकार पाकिस्तानी पक्ष करते हैं। लोग ‘जैसे को तैसा’ वाली स्थिति चाहते हैं ताकि सीमावर्ती गांवों से होने वाले पलायन को रोका जा सके। यह भी सच है कि सीजफायर के सालों के दौरान सीमावर्ती गांवों से स्थाई तौर पर शहरों में जाकर बसने के सिलसिले ने तेजी पकड़ी है।

बढ़ते तनाव और बदलती परिस्थितियों ने शादी-ब्याह के मामलों पर भी अपनी छाप छोड़ी है। पहले इन गांवों की समृद्धता के आकर्षण के कारण शहरों से लोगों द्वारा अपनी बेटियों के ब्याह इन गांवों में खुशी के साथ किए जाते थे और अब सीमावर्ती गांवों में रहने वालों को प्राथमिकता नहीं दी जाती। यही स्थिति लड़कों की शादी ब्याह के संबंध में भी लागू होती है। इसका मुख्य कारण तो पाकिस्तानी सीमा के साथ सटे होने का है क्योंकि बार-बार पलायन करने की स्थिति को कोई भी पसंद नहीं करता है। अपने घरों को अस्थाई तौर पर त्यागने की प्रवृत्ति ने कितनी बुरी तरह से लोगों को जकड़ रखा है कि वे अब वातावरण के थोड़ा सा तनावपूर्ण होते ही सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने की सोचने लगते हैं और जब भी तनाव शब्द की चर्चा आती है तो बच्चों को भी लगने लगता है कि अब उन्हें कहीं और कुछ दिनों के लिए शरण लेनी होगी।

पिछले कुछ सालों के दौरान इन सीमावर्ती गांवों के रहने वालों का जीना भी मुहाल हो चुका है। पहले तो एलओसी से सटे गांवों में रहने वालों को इस प्रकार की परिस्थितियों से दो चार होना पड़ता था कि वे कई कई दिन अपने खेतों में नहीं जा पाते थे और अब यही स्थिति अंतरराष्ट्रीय सीमा के गांवों की है जहां पर होने वाली गोलीबारी असल में अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है लेकिन यह उल्लंघन तभी माना जाएगा जब पाकिस्तानी पक्ष अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानता हो।

सबसे अधिक बुरी दशा उन गांवों की है जो पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे हुए हैं। असल में 1971 के युद्ध के बाद समय के बीतने के साथ ही लोगों ने सीमा के साथ अपने आलीशान घरों का निर्माण इसलिए किया था कि उन्हें लगा था कि अब शायद ही दोनों देशों के बीच इस प्रकार की परिस्थितियां पैदा हों। लेकिन तारबंदी को लेकर 25 सालों बाद जब ऐसी स्थिति पैदा हुई तो उनकी सोच गलत साबित हो गई। अब तो इन गांववासियों के लिए रात के अंधेरे में तो क्या दिन के उजाले में भी कभी कभी सिर बाहर निकाल पाना कठिन होता है। उनके घरों की दीवारों पर पाक गोलियों से होने वाले छिद्र पाक सेना के वहशीपन की मुंह बोलती तस्वीर हैं, जो मात्रा इसलिए दागी गई थीं ताकि भारतीय पक्ष तारबंदी आरंभ न कर सके।

रात के अंधेरे और दिन के उजाले में भी अपने खेतों तक न जा सकने वाले सीमावासियों के लिए प्रत्येक रात को मुसीबत पाक सेना की गोलियों के रूप में आती है। पाकिस्तानी सैनिक रात को इसलिए हमेशा जबरदस्त गोलीबारी कर रहे हैं क्योंकि पिछले कई साल से उन्हें डर लगा रहता है। लेकिन इस प्रकार की स्थिति का सामना पाकिस्तानी सीमावर्ती लोगों को नहीं करना पड़ता है क्योंकि पाक सेना ने अपने अग्रिम गांवों को पहले से खाली करवा रखा है। असल में वह पूरी तैयारी के साथ सीमा पर आ डटा है लेकिन भारतीय पक्ष ऐसा नहीं कर पाता है क्योंकि वह न ही कोई गलत संकेत देना चाहता है और न ही किसी को कोई अवसर।

 सुरेश डुग्गर




Share on Google Plus

0 comments:

Post a Comment