तिल - तिल कर मरने की स्थिति ! Mole-sesame die!





                   संजय त्रिपाठी  

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के आकाश में फैले धुओं ने देश के विकासशीलता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है । इस विकसीत इलाके में धुंध के कारण लोग तिल - तिल कर मरने के तरफ बढ़ रहे हैं । दिल्ली में फिर इमरजेंसी लेवल पर एयर पॉल्यूशन पहुंच गया है । राजधानी में शनिवार सुबह एयर पॉल्यूशन लेवल कम था, लेकिन दिन ढलते-ढलते इसमें अचानक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ऐसे हालात में प्रदूषण पर भी राजनीतिक पार्टियां राजनीतिक खेल खेलने में लगी है । दिल्ली और आसपास की सत्तारूढ़ पार्टियां मिलकर इस समस्या का कोई हल निकालने के वजाय एक - दूसरे को नसीहत देने में लगी हैं । पंजाब से कांग्रेस के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और दिल्ली के आप के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का बयान इसका एक उदाहरण है । वहीं हरियाणा के भाजपा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी कहां पीछे हटने वालों में हैं, वे भी कोई ठोस कार्रवाई करते दिखाई नहीं दे रहे हैं । देखा जाए तो इस समस्या को जन्म देने में अहम भूमिका दिल्ली समेत उसके समीपवर्ती राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब की है । आज दिलली के साथ एनसीआर भी इस गंभीर समस्या का शिकार है, लेकिन इस समस्या का सामाधान किसी एक राज्य के पास नहीं है । इसमें चार राज्यों का योगदान है और इसका हल भी चारों राज्यों को ही मिल कर निकालना होगा । सबसे अहम पहलू यह है कि केंद्र सरकार जब तक अहम भूमिका में आकर इसके सामाधान के लिए पहल नहीं करेगी, तब तक इसका उचित और सार्थक हल नहीं निकल पायेगा । यह समस्या इस साल कोई नई नहीं बल्कि पिछले साल दिवाली के बाद भी बनी थी । सबसे बिड़ंबना यह है कि चारों राज्यों के मुख्यमंत्री इस समस्या के लिए भी अपनी राजनीतिक चाल का ही सहारा ले रहे है, जबकि सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी ने कई उपाय इनके सामने रखा है । एक तरफ दिल्ली के मुख्यमंत्री समझते हैं कि सिर्फ गाड़ियों की सम - विषम संख्या के कार्यक्रम बना देने से ही इसका सामाधान हो जायेगा । वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार साथ ही उनके पार्टी के लोगों की सोच है कि स्वच्छ भारत अभियान का नारा लगाने से ही पर्यावरणीय समस्या का सामाधान हो जायेगा । आज जिस समस्या का सामना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र कर रहा है, धीरे - धीरे यह अपना आकार बढ़ता ही जायेगा और एक दिन गांवो व कस्बों में भी यह समस्या फैल जायेगी । देखा जाए तो इस समस्या के पीछे मुख्य कारण बड़े पैमाने पर एनसीआर का शहरीकरण होना तथा कृषि क्षेत्र में नया परिवर्तन । शहरीकरण ने क्षेत्र को कंक्रीट व पत्थ्रों में तब्दील कर दिया और बाकी जगहों पर घूल ही धूल रह गए । पेड़ों की कटाई होने से वातावरण में आॅक्सीजन की मात्रा में कमी आ गई साथ ही कार्बन की मात्रा कई कारणों से बढ़ गई । पर्यावरण को प्रदूषित करने के कारकों में मुख्य कारक गाड़ियों की धुंआ 25 प्रतिशत, 30 प्रतिशत इण्डस्ट्रीज, 26 प्रतिशत पराली जलाव, 5 प्रतिशत कोयले - धुएं की राख, 8 प्रतिशत कचरा जलाना, 6 प्रतिशत रोड डस्ट - कंस्ट्रक्शन आदि हैं । आज पराली इस समस्या के लिए सबसे बड़ा खलनायक बना है वह हमारी कृषि क्षेत्र में क्रान्ति का मुख्य कारण है । सोचे, पहले गांवों में खेती हल से होती थी तब खेतों में फसलों के डंठल नहीं छोड़े जाते  थे । लोगों के यहां इन डंठलों का प्रयोग पशुओं के चारा के रूप में किया जाता था । हरित क्रांति ने पुराना फसल पद्धति को नष्ट किया और शहरीकरण ने नए जीवनशैली को । आज प्राकृति का दोहन और उसके साथ खिलवाड़ ही आगे हमें तिल - तिल कर मरने पर मजबूर कर देगा । अभी तो हमें बचाव का मोका भी मिल रहा है, लेकिन सही हल नहीं निकाला गया तो यह मौका भी हमारे हाथ से निकाल जायेगा । अपने पड़ोसी देश चीन को देख कर भी हमें सचेत होना चाहिए, सिर्फ विकासशील देश बनने के लाईन में खड़े होन से ही नहीं होगा । चीन ने 16 घंटे के अंदर एक बड़े क्षेत्र का धुंध हटाने में सफलता प्राप्त कर सबको चैका दिया ।
संजय त्रिपाठी  



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