खुल्लम - खुला
अजब मामले का गजब नजारा। आग लगा नहीं, सारे गांव ही जल गए। यूपीए का घोटाला भी कुछ ऐसा ही हमारे सामने आया। कोर्ट का कहना है कि कोई घोटाला हुआ ही नहीं। जब घोटाला नहीं हुआ तो कैग ने कैसे 1.76 लाख करोड़ का घोटाला दिखा दिया। भाई इंडिया में कुछ भी संभव है। यहां भेडिया धसान का सिस्टम है। अपने स्वार्थ या फायदा के लिए आम लोग और राजनीतिक पार्टियां कोई जुमला निकाल देती है। जनता तो पहले से ही इधर - उधर, हाय - तौबा मचाने में ही अपनी बडाई समझती है। सीबीआई कोर्ट के जज ओ पी सैनी जी ने यह भी कहा है कि पहले अभियोजन पक्ष बड़े उत्साह से सारे मामले को रख रहा था, लेकिन फिर वह जरूरत से ज्यादा सतर्क और संभला हुआ सा लगने लगा। जिसके रवैये से यह पता लगाना कठीन हो गया कि वह साबित क्या करना चाहता है। केस के आगे बढऩे के साथ अभियोजन भटकता गया और अंत आते - आते न सिर्फ दिशाहीन हो गया बल्कि उसके इरादे भी संदिग्ध लगने लगे। जस्टिस सैनी ने यह भी कहा कि न तो कोई जांचकर्ता न कोई अभियोक्ता अदालत में पेश की गई चीजों या कही बातों की जवाबदेही लेने को तैयार था। इससे सीबीआई की जांच ही संदिग्ध लग रहा है। असल में पिजड़े का तोता तो पिजड़े में ही ‘ राम - राम ’ कहेगा। तोता तो मालिक का वफादार होता है, ऐसे में बिना मालिक के सहमति के वह चुप ही बैठगा। एक बात और साफ कर दे - हम सब की आदत है, बड़े को लपकना। हम सब का ध्यान छोटे पर नहीं जाता। कैग ने अपने रिपोर्ट में कहा था कि 56 हजार करोड़ से 1.76 लाख करोड़ तक का घोटाला हो सकता है, लेकिन बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने बड़े को झपट कर हो - हल्ला मचा दिया। नतीजा हुआ कि ‘‘ छोटे की खोज में बड़ा भी गया, और पतलून की खोज में लंगोटा भी गया। ’’ चाहे बड़ा जाये या छोटा जाए, जिन्होंने हो - हल्ला मचाने का शुरूआत किय था, उन्हें तो मोटा मिल गया। जनता जाये भाड़ में। जनता आज भी गदगद है, उसे लग रहा है कि हमें जो भी कष्ट झेलना पड़ रहा है वह देश हित में झेलना पड़ रहा है। चाहे वह नोटबंदी हो, चाहे जीएटी हो, चाहे महंगाई हो या 15 - 15 लाख रूपए खोते में आने जैसा झूठा वायदा हो सब कुछ जायज है। देश में हिन्दुत्व बढ़ रहा है, राम मंदिर का निर्माण हो रहा है। सरकार ऐसी जनता को पुन: सत्ता में आने के बाद ताम्र पत्र से नवाजेगी। ऐ जी, ओ जी, टू जी सब छूट जाये, लेकिन गद्दी नहीं छुटनी चाहिए। हमें चिल्लाने में बड़ा मजा आता है, दूसरे पर चिललाने में और ज्यादा, लेकिन जब अपनी बारी आती है तो पेट में जोर की मरोड मचने लगती है। नए नस्ल और ज्यादा चिल्लाने के कला में माहिर है, उन्हें लगता है कि हम जो कर रहे है, वह सब सही है। इसी में मैं हूं, इंसी में इंडिया है। चतुर खिलाड़ी वह जो इन्हें चिल्लाने के लिए छोड़ देता है, और खुद बटोरने लगता है। यूपीए को भी धन्यवाद ही देंगे, क्योंकि जो घोटला उसके शासन काल में हुआ ही नहीं उसके लिए अपनी सरकार पर ही ग्रहण लगा दी। विशेषज्ञ अर्थशास्त्री को भी फजीहत झेलनी पड़ी। मौनवर्त तोडऩे का फायदा उनसे ज्यादा कौन समझ सकता है। यकिन न हो तो गुजरात चुनाव और टू जी ही उठा कर देख लीजिए। बोलने का बहुत फायदा है। इस मामले में अरूण जेटली जी से सीख लेनी चाहिए। सुब्रह्मणयम स्वामी जी भी एक उदाहरण हैं। जो घोटाले से तंग होकर कांग्रेस को कोस रहे थे, इस फैसले के बाद जरूर दयावान बने होंगे। मैं तो सिर्फ यही कहूंगा कि -
लाली मेरे लाल की, जीत देखूं तीत लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।।
संजय त्रिपाठी



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