गांवों में आजकल आपसी भाईचारा और रिश्तों का संबंध बिखरता जा रहा है। लोगों में एक - दूसरे के प्रति इष्र्या, द्वेष और धृणा जैसी भावना बढ़ती जा रही है। गांव भी जैसे - जैसे शहरी चकाचैध क तरफ बढ़ रहा है, वैसे ही आपसी संबंध छीन - छीन होता जा रहा है। पहले शहर में लोग कहते थे कि शांति की खोज गांवों में ही जाकर समाप्त होती है, लेकिन अब ऐसा लगता है कि जिस शांति की खोज में हम गांव में जाते है, वहां शांति तो मिलती नहीं अशांति और ज्यादा ही बढ़ जाती है। आज भी कभी - कभार शहरों में आपसी संबंध में मधुरता व रिश्तो की पक्की डोर का उदाहरण गांव से ही दिया जाता है, लेकिन पिछले दो दसक से इन संबंधों में खटास बढ़ता ही जा रहा है। इसके दो मुख्य कारण नजर आ रहे हैं। पहला तो सबसे बड़ा कारण पंचायती चुनाव और शहरी चकाचैध की भौतिकवादी आवश्यकताएं। चुनाव ने तो रिश्तो में दरार डाला ही है। कभी जमीनी झगड़े जो भूमिका निभाते थे, ठीक आज वैसा ही दरार डालने की भूमिका चुनाव निभा रहा है। शहरी दिखावा और एक - दूसरे से आगे निकलने की होड ने आपसी संबंधों को तार - तार कर रख दिया है। जब मैं 8 वीं कक्षा का छात्र था अपने गांव में ही एक व्यक्ति का सर कटा लाश देखा था। उस समय गांव के लोगों से यह पता चला था कि कुछ गज जमीन को लेकर ऐसी हालात पैदा हुई थी। इसके पीछे सहोदर भाई का ही नाम आया था। हालांकि उसके बाद भी हमारे गांव में आपसी संबंध की मधुरता बरकरार रही। बाद में भी लोग एक - दूसरे के दुख - सुख में खड़ा होते तथा उठ बैठ बना हुआ था। लेकिन अब तो इसमें बहुत दूरी बन गया है। सब अपने में ही संकुचित हो गए है। अपने द्वार पर ही कुडली मारे बैठे रहते हैं। पंचायती चुनाव के कारण भी गांव के आपसी लाला, चाचा, काका जैसा रिश्ता अब लगभग समाप्त सा हो गया है। लोग एक - दूसरे की बुराई और आलोचना में कुछ ज्यादा ही रूचि रखने लगे है। दूसरे को फंसा कर मजा लेने की परिपाटी चल निकली है। अभी छठ के दौरान गांव गया था। हमारे गांव में छठ के दूसरे दिन महाबीरी अखाड़ा का मेला लगता है। गांव में यह परंपरा कई पीढ़ी पहले से चली आ रही है। सब लोग मिलकर इसे अभी भी आपसी सहयोग से चलाते आ रहे है। करीब 18 साल तक मैं भी इसे आगे बढ़ाने में अपना बहुत योगदान दिया। एक तरह से सभी व्यवस्था मेरे ही देख - रेख में होता था। बकायदे इसके लिए ही हर वर्ष मैं गांव चला जाता था। यहां तक की करीब 20 वर्ष पूर्व जब गांव नहीं जा पाते थे तब उस समय अखाड़ा की जिम्मेदारी उठाने वाले दीनानाथ काका के नाम से यहां से अपना चंदा मनिआर्डर कर देता था। इस वर्ष कुछ अलग हटकर देखने को मिला। जब हम लोग व्यवस्था करते थे, तब मन में यह डर होता था कि कोई हमारे कार्य की आलोचना न कर दें। लेकिन अब जो अखाड़ा की व्यवस्था कर रहे हैं वे गांव के बड़े - बुढ़ों के सामने चैड़ा होकर अपने को दर्शा रहे है। इस साल गांव में जो स्थिति देखने को मिली उसने इस संपादकीय को लिखने के लिए मुझे मजबूर किया। पिछले दो वर्ष से गांव के युवा टोली अखाड़ा के लिए चंदे की व्यवस्था व्हाट्सआॅप से कर रहे है। उसके बाद गांव के लोगों से भी उनके श्रद्धानुसार चंदा लिया जाता है। इस बार गांव के एक सबसे बड़े सहयोगी और गांव की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में आपना योगदान देने वाले विजय तिवारी ने अपना चंदा तो किसी युवा को दे दिया जो उसमें लगा हुआ था, लेकिन अन्य लड़को को इसका पता नहीं चला। इसे लेकर आपसी मतभेद बढ़ गया और उनके भतीजा तथा आयोजन करने वाले युवाओं में व्हाट्सआॅप पर ही तकरार बढ़ गया। मोबाईल पर तकरार बढ़ने से विजय तिवारी को चंदा देने के बाद भी अपनी प्रतिष्ठा की हनन नागवार गुजरा और उन्होंने इसे मानिहानि मानते हुए थाने में तहरीर दे दी। दूसरे दिन जब युवाओं को यह पता चला तो वे सब एकजुट हो हल्ला मचाते हुए उनके दरवाजे पर जाकर गाली - गलौज करने लगे। दूसरे दिन यह मामला गंभीर रूप ले लिया। बाद में गांव के ही उनके साथी श्रीकांत तिवारी, दीनानाथ तिवारी, भोला तिवारी, अरविन्द तिवारी आदि ने मामले को किसी तरह खत्म कराया । हालांकि इन सभी ने इस घटना की निंदा की साथ ही गांव के लिए समर्पित रहने वाले लोगों के साथ ऐसी घटना न हो इसके लिए जागरूकता पर जोर दिया। इस मामले में गांव के ही सुमंत कुमार तिवारी ने ऐसी घटना पर दुख जताते हुए लोगों को अपने बच्चों पर अंकुश लगाने तथा गांवई संबंधों को जिन्दा रखने के लिए युवाओं को प्रेरित करने पर जोर दिया। आज के समय में इस और गांव के सभी लोगों को ध्यान देना होगा ताकि लाला, काका, चाचा और भाई का आपसी रिश्ता और ज्यादा गहरा हो।
संजय त्रिपाठी



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