संपादकीय - न्याय मांगे न्याय By संजय त्रिपाठी Editorial - justice demands justice




आजाद भारत की पहली घटना ! शर्मनाक........... बेहद शर्मनाक !
दिल - दिमाग को झकझोर दिया, पूरा देश अचंम्भित?
इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।
क्या लोगों में पहले जैसा ही विश्वास सर्वोच्च न्यायपलिका में बना रहेगा ? शायद नहीं..........!
अविश्वास का अंकुर फूट कर बाहर आ गया है, लोगों को भारत के न्याय पद्धति पर अंगुल उठाने का मौका मिल गया। शायद अब कलमकारो की कलम न्यायाघीशों पर अंगुली उठाने में कई बार नहीं सोचेगी, शायद अब कोर्ट के अवमानना का डर नहीं सतायेगा। लोगों में देश के न्यायपलिका के प्रति एक श्रधा, विश्वास, आशा और उम्मीद नजर आती थी। निराश व्यक्ति भी इसके दहलीज पर पहुंचते ही जोश, जुनून और उम्मीद से भर उठता था, लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायमूर्तियों द्वारा प्रेस काॅन्फ्रेस कर न्यायपालिका और लोकतंत्र को बचाने की अपील करने के बाद भी लोगों में पहले जैसा ही उम्मीद की किरण दिखाई देगा ? देखा जाय तो उनके आरोप सामान्य नहीं है और न ही यह घटना सामान्य है। वरिष्ठ न्यायाधीशों की आपत्ति उस रोस्टर के लेकर है, जिसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश यह तय करते हैं कि कौन सा मुकदमा किस पीठ के पास जायेगा। निश्चित तौर पर लोकतंत्र या कोई भी व्यवस्था कार्य विभाजन पर ही चलती है और उसके लिए एक प्रशासन होता है। जजो का आरोप है कि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा सारे महत्वपूर्ण मामले स्वयं सुनते हैं और दूसरे जजों को उस काम का मौका नहीं देते । देश की व्यवस्था के लिए अहम मामले भी कुछ खास जजों के पास जाते हैं और यह कार्य वितरण तर्क और विवके के आधार पर नहीं होता। फिर सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति बीएम लोया की मौत पर दायर जनहित याचिका भी सीजेआई ने मनमाने तरीके से कोर्ट नंबर 10 को भेज दी। चारो जज मेडिकल काॅलेज घोटाले के उस मामले से भी खफा है, जिसकी सुनवाई सीजेआई ने एक बेंच विशेष से छीनकर दूसरे को दे दी थी। उनकी चैथी आपत्ति न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी सरकार के साथ निर्धारित सहमति - पत्र के बारे में है, जिस पर एक बार पांच जजों की पीठ से सुनवाई हो चुकी है, लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने उसे छोटी बेंच को भेज दिया। यह सारे मामले एक - एक कर पहले भी उठते रहे है, लेकिन जिस तरह से चार वरिष्ठ जजों ने एक साथ मिलकर मुख्य न्यायाधीश की न्यायिक दृष्टि और प्रशासन पर संदेह व्यक्त किया है वह पूरी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर देने वाली घटना है। पर सवाल है कि क्या सचमुच स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि नाराज न्यायाधीशों के लिए आपस में मिल-बैठ कर कोई व्यावहारिक रास्ता निकालना संभव नहीं रह गया था! फिर, इस तरह मीडिया के सामने अपना आक्रोश और नाराजगी जाहिर करने से आखिर हासिल क्या होगा! इससे लोकतंत्र के तीसरे बड़े स्तंभ की साख पर सवालिया निशान बेशक लग गया है। कहीं इसे नजीर मानते हुए निचली अदालतों के न्यायाधीश भी अपनी नाराजगी प्रकट करने का यही रास्ता तो अख्तियार नहीं करेंगे! अनेक संस्थानों में वरिष्ठ और कनिष्ठ कर्मियों के बीच मतभेद देखे जाते हैं। पर न्यायपालिका चूंकि लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ है, अन्याय के विरुद्ध फैसले सुनाने की जिम्मेदारी उस पर है, लोकशाही को सशक्त बनाने के मकसद से उसे विधायिका और कार्यपालिका के आचरण पर अंगुली उठाने का अधिकार है, इसलिए वहां इस तरह मतभेदों का सतह पर आना उसकी गरिमा के अनुकूल नहीं माना गया है। इसलिए न्यायाधीशों, खासकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे बिना किसी दलगत या वैचारिक दबाव में आए, आपसी तालमेल से न्याय व्यवस्था को सुचारु बनाने का प्रयास करें। अहं के टकराव या फिर सुर्खियों में बने रहने के मकसद से फैसले सुनाने, बयान देने जैसे कदम से बचें। इस तकाजे का निर्वाह न हो पाने की वजह से ताजा प्रकरण अधिक गंभीर विषय बन गया है। इस प्रकरण के बाद न सिर्फ देश, बल्कि दुनिया में बहुत गलत संदेश गया है। विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक रंग भी देना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर दलों में बंटे लोग एक तरफ मुख्य न्यायाधीश को गलत साबित करने के लिए उनके पैतृक गांव की भूमिका बना कर उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है, तो दूसरी तरफ दूसरा गुट चारों जजों का संबंध और कार्यशैली पर उंगली उठाते हुए गलत दिखाने का तर्क दे रहा हैै। खैर, इस तरह तो अब हर मुद्दे पर हो रहा है। कुछ ज्यादा ही लोग आज कल ओच्छी तर्को के सहारे दूसरे को गलत दिखाने में लगे है। इस तरह के हालात के लिए न्यायापालिका में न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग ही जिम्मेदार है। उन्हें भी सोचना चाहिए - ‘ बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो खाक की।’ अंत में यही कहा जायेगा कि न्यायपालिका को अपनी स्वायत्तता का सम्मान करते हुए, पारस्परिक तालमेल से अपने मतभेदों और अंदरूनी अव्यवस्थाओं को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। बहुत दुःख के साथ देश की आज की हालात पर किसी शायर की दो पंक्तियां याद आती है - 
‘‘ बरबाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है।
   हर डाल पर उल्लू बैठा हो, अंजाम - ए - गुलिस्तां क्या होगा ? ’’ 

संजय त्रिपाठी


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